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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४२
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सूत उवाच
इत्युक्तः स द्विजश्रेष्ठो व्यासशिष्यः प्रतापवान् |  ३   क
प्रोवाच वदतां श्रेष्ठस्तं नृपं जनमेजय़म् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति