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शान्ति पर्व
अध्याय २५८
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भीष्म उवाच
शिशोः शुश्रूषणाच्छुश्रूर्माता देहमनन्तरम् |  ३१   क
चेतनावान्नरो हन्याद्यस्य नासुषिरं शिरः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति