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शान्ति पर्व
अध्याय २५८
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भीष्म उवाच
चिरं सञ्चिन्तय़न्नर्थांश्चिरं जाग्रच्चिरं स्वपन् |  ५   क
चिरकार्याभिसम्पत्तेश्चिरकारी तथोच्यते ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति