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शान्ति पर्व
अध्याय २५८
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भीष्म उवाच
गौतमस्तु सुतं दृष्ट्वा शिरसा पतितं भुवि |  ५८   क
पत्नीं चैव निराकारां परामभ्यगमन्मुदम् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति