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शान्ति पर्व
अध्याय २५८
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भीष्म उवाच
रागे दर्पे च माने च द्रोहे पापे च कर्मणि |  ६७   क
अप्रिय़े चैव कर्तव्ये चिरकारी प्रशस्यते ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति