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शान्ति पर्व
अध्याय २५८
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भीष्म उवाच
वन्धूनां सुहृदां चैव भृत्यानां स्त्रीजनस्य च |  ६८   क
अव्यक्तेष्वपराधेषु चिरकारी प्रशस्यते ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति