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शान्ति पर्व
अध्याय २५८
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भीष्म उवाच
चिरं धारय़ते रोषं चिरं कर्म निय़च्छति |  ७१   क
पश्चात्तापकरं कर्म न किञ्चिदुपपद्यते ||  ७१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति