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शान्ति पर्व
अध्याय २५८
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भीष्म उवाच
चिरमन्वास्य विदुषश्चिरं शिष्टान्निषेव्य च |  ७३   क
चिरं विनीय़ चात्मानं चिरं यात्यनवज्ञताम् ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति