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वन पर्व
अध्याय २५८
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्राप्तमप्रतिमं दुःखं रामेण भरतर्षभ |  १   क
रक्षसा जानकी तस्य हृता भार्या वलीय़सा ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति