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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
स्नात्वा कुरुवरश्रेष्ठ प्रय़तात्मा तु मानवः |  ९३   क
तर्प्य देवान्पितॄंश्चैव विष्णुलोके महीय़ते ||  ९३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति