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वन पर्व
अध्याय २५८
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मार्कण्डेय़ उवाच
पितरं स समुत्सृज्य पितामहमुपस्थितः |  १३   क
तस्य कोपात्पिता राजन्ससर्जात्मानमात्मना ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति