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वन पर्व
अध्याय २५८
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मार्कण्डेय़ उवाच
स जज्ञे विश्रवा नाम तस्यात्मार्धेन वै द्विजः |  १४   क
प्रतीकाराय़ सक्रोधस्ततो वैश्रवणस्य वै ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति