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वन पर्व
अध्याय २५८
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मार्कण्डेय़ उवाच
पितामहस्तु प्रीतात्मा ददौ वैश्रवणस्य ह |  १५   क
अमरत्वं धनेशत्वं लोकपालत्वमेव च ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति