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शान्ति पर्व
अध्याय २५९
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द्युमत्सेन उवाच
यत्र यत्रैव शक्येरन्संय़न्तुं समय़े प्रजाः |  १७   क
स तावत्प्रोच्यते धर्मो यावन्न प्रतिलङ्घ्यते ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति