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शान्ति पर्व
अध्याय २२०
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भीष्म उवाच
हो हि विश्वासमर्थेषु शरीरे वा शरीरभृत् |  ९१   क
कर्तुमुत्सहते लोके दृष्ट्वा सम्प्रस्थितं जगत् ||  ९१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति