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शान्ति पर्व
अध्याय २५९
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द्युमत्सेन उवाच
यत्र वै पापकृत्क्लेश्यो न महद्दुःखमर्छति |  ३०   क
वर्धन्ते तत्र पापानि धर्मो ह्रसति च ध्रुवम् |  ३०   ख
इति कारुण्यशीलस्तु विद्वान्वै व्राह्मणोऽन्वशात् ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति