वन पर्व  अध्याय २५९

मार्कण्डेय़ उवाच

ततो वैश्रवणं तत्र ददृशुर्नरवाहनम् |  १४   क
पित्रा सार्धं समासीनमृद्ध्या परमय़ा युतम् ||  १४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति