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वन पर्व
अध्याय २५९
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मार्कण्डेय़ उवाच
अधःशाय़ी कुम्भकर्णो यताहारो यतव्रतः |  १७   क
विभीषणः शीर्णपर्णमेकमभ्यवहारय़त् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति