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वन पर्व
अध्याय २५९
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मार्कण्डेय़ उवाच
खरः शूर्पणखा चैव तेषां वै तप्यतां तपः |  १९   क
परिचर्यां च रक्षां च चक्रतुर्हृष्टमानसौ ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति