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भीष्म पर्व
अध्याय ९७
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सञ्जय़ उवाच
ते तस्य विविशुस्तूर्णं काय़ं निर्भिद्य मर्मणि |  १५   क
स तैर्विभिन्नसर्वाङ्गः शुशुभे राक्षसोत्तमः |  १५   ख
पुष्पितैः किंशुकै राजन्संस्तीर्ण इव पर्वतः ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति