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वन पर्व
अध्याय २५९
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मार्कण्डेय़ उवाच
स राजराजो लङ्काय़ां निवसन्नरवाहनः |  ३   क
राक्षसीः प्रददौ तिस्रः पितुर्वै परिचारिकाः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति