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वन पर्व
अध्याय २५९
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मार्कण्डेय़ उवाच
राक्षसस्तु वरं लव्ध्वा दशग्रीवो विशां पते |  ३२   क
लङ्काय़ाश्च्यावय़ामास युधि जित्वा धनेश्वरम् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति