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वन पर्व
अध्याय २५९
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मार्कण्डेय़ उवाच
यस्तु त्वां समरे हन्ता तमेवैतद्वहिष्यति |  ३५   क
अवमन्य गुरुं मां च क्षिप्रं त्वं न भविष्यसि ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति