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वन पर्व
अध्याय २५९
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मार्कण्डेय़ उवाच
विभीषणस्तु धर्मात्मा सतां धर्ममनुस्मरन् |  ३६   क
अन्वगच्छन्महाराज श्रिय़ा परमय़ा युतः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति