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द्रोण पर्व
अध्याय १३३
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कर्ण उवाच
पाञ्चालान्केकय़ांश्चैव वृष्णींश्चापि समागतान् |  ११   क
वाणौघैः शकलीकृत्य तव दास्यामि मेदिनीम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति