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शान्ति पर्व
अध्याय २८८
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हंस उवाच
आक्रुश्यमानो नाक्रोशेन्मन्युरेव तितिक्षतः |  १६   क
आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति