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शान्ति पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
जटाजिनधरा दान्ताः पङ्कदिग्धा जितेन्द्रिय़ाः |  १५   क
मुण्डा निस्तन्तवश्चापि वसन्त्यर्थार्थिनः पृथक् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति