अनुशासन पर्व  अध्याय २६

अङ्गिरा उवाच

देशकाल उपस्पृश्य तथा सुन्दरिकाह्रदे |  १९   क
अश्विभ्यां रूपवर्चस्यं प्रेत्य वै लभते नरः ||  १९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति