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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
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वैशम्पाय़न उवाच
चारय़ेथाश्च सततं चारैरविदितैः परान् |  १५   क
परीक्षितैर्वहुविधं स्वराष्ट्रेषु परेषु च ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति