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अनुशासन पर्व
अध्याय २६
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अङ्गिरा उवाच
रामह्रद उपस्पृश्य विशालाय़ां कृतोदकः |  ४४   क
द्वादशाहं निराहारः कल्मषाद्विप्रमुच्यते ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति