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अनुशासन पर्व
अध्याय २६
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अङ्गिरा उवाच
उज्जानक उपस्पृश्य आर्ष्टिषेणस्य चाश्रमे |  ५२   क
पिङ्गाय़ाश्चाश्रमे स्नात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति