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अनुशासन पर्व
अध्याय २६
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अङ्गिरा उवाच
कुल्याय़ां समुपस्पृश्य जप्त्वा चैवाघमर्षणम् |  ५३   क
अश्वमेधमवाप्नोति त्रिरात्रोपोषितः शुचिः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति