अनुशासन पर्व  अध्याय २६

अङ्गिरा उवाच

पिण्डारक उपस्पृश्य एकरात्रोषितो नरः |  ५४   क
अग्निष्टोममवाप्नोति प्रभातां शर्वरीं शुचिः ||  ५४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति