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शान्ति पर्व
अध्याय २८०
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पराशर उवाच
अज्ञानाद्धि कृतं पापं तपसैवाभिनिर्णुदेत् |  ६   क
पापं हि कर्म फलति पापमेव स्वय़ं कृतम् |  ६   ख
तस्मात्पापं न सेवेत कर्म दुःखफलोदय़म् ||  ६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति