आश्वमेधिक पर्व  अध्याय २६

व्राह्मण उवाच

कामचारी तु कामेन य इन्द्रिय़सुखे रतः |  १५   क
व्रतवारी सदैवैष य इन्द्रिय़जय़े रतः ||  १५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति