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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २६
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व्राह्मण उवाच
एको द्वेष्टा नास्ति ततो द्वितीय़ो; यो हृच्छय़स्तमहमनुव्रवीमि |  ५   क
तेनानुशिष्टा गुरुणा सदैव; लोकद्विष्टाः पन्नगाः सर्व एव ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति