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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २६
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वैशम्पाय़न उवाच
त्वं चापि राजशार्दूल तपसोऽन्ते श्रिय़ा वृतः |  १६   क
गान्धारीसहितो गन्ता गतिं तेषां महात्मनाम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति