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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
हताश्वात्तु रथात्तूर्णमवप्लुत्य नरर्षभः |  ५१   क
आरुरोह रथं तूर्णं कृपस्य शरपीडितः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति