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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २६
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वैशम्पाय़न उवाच
तव शुश्रूषय़ा चैव गान्धार्याश्च यशस्विनी |  १८   क
भर्तुः सलोकतां कुन्ती गमिष्यति वधूस्तव ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति