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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २६
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वैशम्पाय़न उवाच
तथा सर्वे नारदं विप्रसङ्घाः; सम्पूजय़ामासुरतीव राजन् |  २२   क
राज्ञः प्रीत्या धृतराष्ट्रस्य ते वै; पुनः पुनः समहृष्टास्तदानीम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति