वन पर्व  अध्याय ३३

द्रौपद्यु उवाच

सर्वमेव हठेनैके दिष्टेनैके वदन्त्युत |  ३०   क
पुरुषप्रय़त्नजं केचित्त्रैधमेतन्निरुच्यते ||  ३०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति