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द्रोण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
तेषामापततां तूर्णं गाण्डीवप्रेषितैः शरैः |  ५   क
शिरांसि पातय़ामास वाहूंश्चैव धनञ्जय़ः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति