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वन पर्व
अध्याय २०
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वासुदेव उवाच
त्वं हि शाल्वप्रय़ुक्तेन पत्रिणाभिहतो भृशम् |  ४   क
कश्मलाभिहतो वीर ततोऽहमपय़ातवान् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति