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वन पर्व
अध्याय २६
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मार्कण्डेय़ उवाच
स चापि शक्रस्य समप्रभावो; महानुभावः समरेष्वजेय़ः |  १०   क
विहाय़ भोगानचरद्वनेषु; नेशे वलस्येति चरेदधर्मम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति