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वन पर्व
अध्याय २६
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वैशम्पाय़न उवाच
तमेवमुक्त्वा वचनं महर्षि; स्तपस्विमध्ये सहितं सुहृद्भिः |  १८   क
आमन्त्र्य धौम्यं सहितांश्च पार्थां; स्ततः प्रतस्थे दिशमुत्तरां सः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति