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वन पर्व
अध्याय २६
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मार्कण्डेय़ उवाच
न तात हृष्यामि न च स्मय़ामि; प्रहर्षजो मां भजते न दर्पः |  ७   क
तवापदं त्वद्य समीक्ष्य रामं; सत्यव्रतं दाशरथिं स्मरामि ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति