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कर्ण पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
स विक्षरन्रुधिरं सर्वगात्रै; रथानीकं सूतसूनोर्विवेश |  ७   क
मय़ाभिभूतः सैनिकानां प्रवर्हा; नसावपश्यन्रुधिरेण प्रदिग्धान् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति