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वन पर्व
अध्याय ८०
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नारद उवाच
तं दृष्ट्वा निय़मेनाथ स्वाध्याय़ाम्नाय़कर्शितम् |  २१   क
भीष्मं कुरुकुलश्रेष्ठं मुनिः प्रीतमनाभवत् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति