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अनुशासन पर्व
अध्याय १०
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पुरोहित उवाच
सव्रीडं वै भवति हि मनो मे हसता त्वय़ा |  ४५   क
कामय़ा शापितो राजन्नान्यथा वक्तुमर्हसि ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति