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उद्योग पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
महासहाय़ः प्रतपन्वलस्थः; पुरस्कृतो वासुदेवार्जुनाभ्याम् |  १९   क
वरान्हनिष्यन्द्विषतो रङ्गमध्ये; व्यनेष्यथा धार्तराष्ट्रस्य दर्पम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति