वन पर्व  अध्याय ५९

वृहदश्व उवाच

नष्टात्मा कलिना स्पृष्टस्तत्तद्विगणय़न्नृपः |  २५   क
जगामैव वने शून्ये भार्यामुत्सृज्य दुःखितः ||  २५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति